किशोरे कुमार की आवाज़ मे
फिल्म पड़ोसन का गाना की मेरे सामने वाली खिड़की मे एक चांद तुकड़ा रहता है तो हम सब को याद होगा ही जब चांद के दीदार की एक अदद आश मे आशिकों ने ज़िंदगी भर इंतज़ार किया है ऐसे हज़ारों किस्से हैं मगर अब तो हालत बदल गये हैं रहता रहा होगा किसी जमाने मे सामने वाली खिड़की मे चांद का
टुकड़ा आज हमारे घरों से तो खिड़कियां गायब हुई ही हमारे ज़िंदगी से भी गायब हो
चलीं. , दुनिया के खुलेपन को बंद कमरों की कैद मे ही पा लेने की चाहत ने हमारे अंदर के
धडकते दिल को मार डाला है जहां हम सिर्फ और सिर्फ अपने मै मे सिमटते जा रहे हैं ।
पता नहीं सामने वाली दमघोटू चारदीवारी के अंधेरों मे
कौन रहता है. उस कभी ना खुलने वाले खिड़की के अंदर पता नहीं कितने प्यार पनपने से
पहले ही मर जाते हैं और हम हैं की कंक्रीट की ये जेलें जिसे महल समझने की भूल कर
बैठते हैं बनाने से बाज नहीं आते. सर पर एक
छत बनाने की चाह मे इंसान घर पर घर लड़ता गया और छतों को खत्म करने के साथ ही उस
छत से दिखाने वाली दुनिया के बाहरी जुड़ाव को भी खत्म कर लिया . प्यार चाहे छत का
हो अथवा खिड़की का जिसके बारे मे हमारे भारतीय समाज मे तो अनगिनत कहानिया हैं कभी
सफल तो कभी असफल पर ये जरूर था की एक दिल था जो दो दीवारों को बीच इस खिड़की और छत
के मध्यम से धड़कता था पर पत्त्थरों की इन गगनचुंबी इमारतों ने हमारा अंदर के
इंसान को मार डाला इमारतें जितनी उंची हुई हमारा कद उतना ही बौना होता चला गया। समावेशी विकास की प्रक्रिया मे
पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की बहस दिन प्रतिदिन तेज होती जा रही है . अब
हरित पर्यावरण की रक्षा के लिये हरित अर्थव्यवस्था ,हरित न्यायालय ,हरित राजनीति जैसे मुद्दों के
साथ ही एक ऐसी जीवन शैली को बढ़ावा दिये जाने की बात की जा रही है जो पर्यावरण
मैत्री हो हमारे जीने का नितांत भौतिकतावादी तरीका एक दिन सब कुछ तहस नहस ना कर दे
इसलिये ईको फ्रैंडली जिंदगी को अपनाने के लिये लोगों को जागरूक किया जा रहा
है हमारे शहरों मे आये दिन भवन गिरने से होने वाली मौतों ,भवनों का भूकंपरोधी ना होना ,तथा ज्यादातर भवन ऐसे ही हैं जहां पर की दिन और रात का पता
ही नहीं चलता है। बहुत ही कम घरों मे खिड़कियां देखने को मिलती हैं। हम नदियों और पहाड़ों की छाती चीरकर अगर ऐसे ही बड़े बड़े भवन बनाते रहे तो एक
दिन सब कुछ नष्ट हो जाएगा सूरज की पहली और आखिरी किरण से कटी दडबों मे कटती हमारी
ज़िंदगी इतनी दमघोंटू हो गयी है की हम हवा के लिये प्लास्टिक के पंखों पर और रोशनी
के लिये बिजली की बल्बों पर निर्भर होते जा रहे हैं। आखिर इन सब की भी तो एक सीमा
है आखिर कृतिम हवा लेकर हम कब तक ज़िंदगी की सांस ले पायेंगे और बल्बों की रोशनी
हमारे ज़िंदगी के अंधेरे कब तक दूर करेगी। हमारे एतिहासिक काल मे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के समय भवन निर्माण कला प्रकृति
के बेहद करीब थी परंतु सभ्यता के विकास क्रम मे आधुनिक विज्ञान और तकनीकी से लैश
होकर भी हम उनसे हज़ारों साल पीछे हो गये हैं तथा छद्म भौतिकतावाद और पूंजीवाद
द्वारा बिछाये जाल मे ऐसे फंसे हैं की हालत यह हो गये हैं की आयेज कुंवा और पीछे
खाई और एक ऐसे बाज़ार मे खड़े हो गये हैं जहां हमने प्राकृतिक संसाधनों के साथ ही
खुद को भी बेच डाला है। ये गगनचुंबी इमारतें प्रलय की आंधी मे चकनाचूर हो जाएं इससे
पहले हमे सचेत हो जाने की आवश्यकता है समय की मांग है की गांव मे मिट्टी के कच्चे
मकानो को डहा कर बनाई गयी आग उगलने वाली इंट की दीवारों और शहर मे कंक्रीट
के बड़े महलों की निर्माण प्रक्रिया को पर्यावरण मैत्री बनाया जाये और हम ऐसे हरित
भवनों का निर्माण करें जो की हमारे आंतरिक और बाह्य दोनो स्वास्थ्य को संतुलित
करें क्यूं रोटी कपड़ा की तरह मकान भी हमारी ज़िंदगी को प्रभावित करता है और
प्रदूषित मकान हमारी मानसिकता को भी प्रभावित करता है। हम अगर मकान ना रहे तो
ज़िंदा रह सकते हैं जैसा की इतिहास भी रहा लेकिन अगर पर्यावरण को दांव पर लगाकर
आशियाने बनाये तो इंसान के अस्तित्व की कल्पना भी अकल्पनीय लगती है।दीवार की
खिड़कियां मीट जाएं इससे पहले हमारे जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिये जरूरी है
की मिल जुल कर इसे बचाया जाये। घर भले ही छोटा हो लेकिन छत और खिड़की का अस्तित्व
कायम रहे। अंततः दुष्यंत कुमार का यह शेर"इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात / अब
किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ.
No comments:
Post a Comment