स्थायी पते की तलाश
समकालीन कवि मिथिलेस श्रीवास्तव की कविता ‘‘हममे से हर एक का एक स्थायी पता है’’ पढ़ने के बाद बरबस यह बात सोचने को मजबूर हो गया की हम मे से हर एक का पता क्या स्थायी पता है या की कुछ दिनो बाद उस पते पर कोई और आ जाएगा । हम सब के मन मे एक स्थायी घर का पता होता है ,कुछ लोग एक बार घर छोड़ने के बाद शायद दुबारा फिर कभी वापस नहीं जाते हैं वो ज़िंदगी भर अपने घर या गाँव के रूप मे वही घर बताते हैं लेकिन अपने ज़िंदगी की आखिरी सांस एक किराए के कमरे मे लेते हैं और बिजली की शवगृहों मे जला दिये जाते हैं , उनके बल बच्चे बची हुई जमीन जायदाद के लिए उस स्थायी पते की खोज मे भटकते फिरते हैं और कुछ दिन बाद अपने ही घर मे अजनबियों की सी ज़िंदगी काटने के बाद फिर अस्थायी कहे जाने वाले उसी स्थायी घर मे वापस आ जाते हैं । वहाँ पर ऐसे लोगों के गली मुहल्ले हैं जिनके पते अस्थायी ही हैं इसमे हर वर्ग के लोग हैं उच्च अधिकारी से लेकर चपरासी और मजदूर तक हैं । पडोसे के सरकारी क्वाटर मे रहने वाले डॉक के वे बाबूजी तो भुलाए नहीं भूलते जिन्होने अपनी ज़िंदगी के ४० साल एक ही कमरे मे काट दिये और फिर रिटायर होने के बाद वो कमरा छोड़ने का फरमान आ गया , मुझे याद है मैंने उन्हे उस कमरे की दीवारों से लिपट के चिल्ला चिल्ला कर पहली बार रोते हुये देखा था , हम सब ने उन्हे बहुत समझाया बगल के कमरों के लोग यही कहते रहे की ये आपका ही कमरा रहेगा आप आते रहिएगा बाउजी बेमन से किसी और पते की तलाश मे चले गए क्यूंकी बल बच्चे विदेश रहते थे और मैंने अपनी समझ के बरसों मे उन्हे कभी अपने बच्चो से मिलते नहीं देखा था। कुछ दिनो तक उनके नाम से उसी पते पर चिट्ठियाँ आयीं ,कुछ मिलने वाले लोग भी आए और फिर बात आई गयी हो गयी कमरे मे कोई और आ गए फिर से जाने के लिए।
मिथिलेश जी ने संवेदना के तारों को झकझोरते हुए उस जगह का जिक्र किया है जहां से हम उजड़े थे ,दरअसल वही हमारा स्थायी पता है । पुलिस अपने वर्तमान पते पर रहने वाले लोगों से उनके स्थायी पते पूछती है और जिसका कोई स्थायी पता नहीं है वह उन्हे शक की नजरों से देखती है। पुलिस कभी भी यह बात मान ही नहीं सकती है की अमुक व्यक्ति का वर्तमान पता ही उसका स्थायी पता है । जिनका वर्तमान पते के अलावा कोई स्थायी पता नहीं है पुलिसे उन्हे संदिग्ध मानती है। हम अपने वर्तमान के घरों को कितने प्यार से सजाते हैं सँवारते हैं और एक दिन मकान मालिक जिसको की यह दंभ है की सारी दुनिया उसी की किराएदार है आकार हमसे कमरा खाली करवा लेता है और हम बेबस लाचार फिर किसी पते की तलाश मे निकाल पड़ते हैं । स्थायी पते की तलाश शायद उम्र भर चलती रहती है और एक दिन किसी पते पर हम आखिरी साँसे लेकर एक अज्ञात पते की तरफ विदा हो जाते हैं ।
ऐसा भी नहीं है की यह समस्या सिर्फ गरीब या की माध्यम वर्ग के लोगों के साथ है बड़े बड़े निवर्तमान मंत्री जब अपने बंगले खाली करने मे आनाकानी करते हैं तब उनका भी दर्द समझ आता है और उसका भी दर्द जो अभी हाल मे ही मंत्री बना है और जल्दी से ही अपने नए पते पर बस जाना चाहता है ।
आखिर जो केजरीवाल एक दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री थे आज उन्हे एक अदद घर की तलाश मे दर दर भटकना पड रहा है । कभी विपक्षी पार्टियां टांग अड़ा देती हैं तो कभी कोर्ट ,तो कभी कभी खुद मकान मालिक ही। मुझे तो राजधानी दिल्ली मे छेत्रवाद की पूरी की पूरी राजनीति ही कभी कभी बौनी नजर आने लगती है क्यूंकी यह दिल्ली सबकी भी है और किसी की भी नहीं है । कोई बहुत बरस पहले सुदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से आया था तो कोई हरियाणा के गांवो से ,राजधानी बनने के बाद सम्पूर्ण भारत से दिल्ली की तरफ पलायन बढ़ा और दिल्ली मे देखते ही देखते पूरा भारतवर्ष ही बस गया। विभाजन के बाद जिन लोगों को सरकार ने दिल्ली मे जमीने आवंटित की और आज उनके अपने घर हैं वे भी खुद को कभी दिल्ली वाला नहीं मानते हैं उनके पूर्वज उनका गाँव सब पाकिस्तान मे हैं । बहुत कम ही लोग उनमे से कभी पाकिस्तान और फिर वहाँ अपने गाँव जा पाते होंगे फिर भी उनके अवचेतन मन मे उनका स्थायी पता वही है । खुद को शुद्ध दिल्ली वाला कहने वाले लोग जब शादी व्याह करते हैं तो उसी राज्य को ज्यादा तवज्जो देते हैं जहां उनके पूर्वज के भी पूर्वज रहे हों।
और चलते चलते एक बात मन को कचोट जाती है की दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के फूटपथों पर जो लोग रात को सोते हैं दिन मे भी उनका समान वहीं रहता और वो कहीं अपना पेट पाल रहे होते हैं आखिर उनका स्थायी पता क्या होता होगा,पता नहीं किस पल कोई गाड़ी उन्हे कुचल जाए और उनके ज़िंदगी की आखिरी सांस हो क्यूंकी शराब के नशे मे धुत भाई लोगों के लिए तो ये कीड़े मकोड़े ही हैं अपनी जमात मे ही क्या वो अपना पता ऐसे बताते होंगे की फलां जगह की फलां सड़क वाले फूटपाथ पर। मगर उस फूटपाथ पर तो कोई कमरा नंबर या की बेड नंबर नहीं होता है उनके ही जमात के लोग उनसे कैसे मिलते होंगे । इनके लिए बनने वाले रैन बसेरे भी बस कुछ समय बाद ही नष्ट हो जाते हैं । बंजारा और बेड़िया काही जाने वाली जाती के लोग जो जिंदगीभर घूम घूम कर ही अपना पेट पालते हैं उनका स्थायी पता क्या होगा ।
खैर हम इस बहस मे कितना भी उलझ लें स्थायी पते का स्थायी हल समझ नहीं आता है, हम जिसे अपना घर समझते है वहाँ कल को कोई और होता है जिस घर को हमने बचपन मे ही छोड़ दिया वहाँ दुबारा लौट नहीं पाते जाते भी हैं तो अपने ही घर पे कोई पहचानने वाला नहीं होता ।
अंततः मिथिलेश जी के ही कविता की अंतिम पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करता हूँ की .....
बच्चे से पुलिस उसका पता पूछती है
बच्चा तो अपनी माँ के गोद मे छुप जाता है
वही उसका स्थायी और वर्तमान पता है
No comments:
Post a Comment