Wednesday, 4 June 2014

कांव कांव

                कांव कांव
अभी कुछ दिनो पहले राजस्थान के उदयपुर मे रहने वाले मित्र भंवर के गाँव जाना हुआ और वहाँ एक ऐसा वाकया हुआ जिसे चाह कर भी  मै नहीं भुला सकता और शायद आपके लिए भी यह घटना अविस्मरनीय बन जाए । हम सब घर के दरवाजे पर बैठे हुये थे की इतने मे कौए का एक जोड़ा आकार कांव कांव करने लगा,काफी देर बाद जब हम सब का ध्यान उनकी तरफ गया तो पास मे बैठे गाँव के एक बुजुर्ग ने बताया की मादा कौआ नर कौए से कह रहा है की उसे बहुत ज़ोरों की प्यास लगी है और नर कौआ कह रहा है की इंतज़ार करो अभी कोई इधर आएगा और पास रखे पत्थर से लगकर उसके हाथ से पानी  गिर जाएगा और तब तुम जाकर पी लेना यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग हंस पड़े और उनका मज़ाक उड़ाया और मुझे भी इस बात मे कोई सच्चाई नहीं लगी ,लेकिन थोड़ी देर बाद देखते हैं की पड़ोस से एक लड़की पानी  लेकर निकली और वहाँ पड़े पत्थर से टकरा गयी और उसके हाथ का पानी गिर गया ,मादा कौए ने जाकर अपनी प्यास बुझाई । हम सब लोग आश्चर्यचकित थे और वह बुजुर्ग सामान्य  भाव से ही बैठे रहे । उन्हे किसी ज्योतिष विद्या का ज्ञान नहीं था और ना ही   वह कोई भाषाविद  उन्होने पशु पक्षियों की भाषा पर कोई कोई शोध भी नहीं किया है । हमारे मित्र ने उनसे बहुत गुजारिश की की वह बताएं की  उन्हे कैसे यह पता चला इसका सूत्र क्या है ,हमारी बहुत कोशिशों के बावजूद वह बुजुर्ग चाह कर भी कुछ नहीं बता सके या यूं कह लें की हम समझ नहीं सके,क्यूंकी शायद उस कौए की भाषा समझने के लिए जिस संवेदना की जरूरत है वह इस यांत्रिकता के दौर मे हममे मरती जा रही है हम एक रोबोट बनते जा रहे हैं जो कुछ निश्चित निर्देशो  की भाषा ही समझता है  इसके अलावा आप चिल्लाकर मर जाएँ वह नहीं समझेगा आपको।
भाषा वैज्ञानिकों की पशु पक्षियों की बोलचाल की भाषा को लेकर तरह तरह  की मान्यताएं हैं ,कुछ का मानना है की सम्पूर्ण विश्व मे पक्षियों की भाषा एक ही होती है ,कुछ कहते हैं यह अपने हाव भाव द्वारा एक दूसरे को समझते हैं। बहरहाल भाषा वैज्ञानिकों की इस बहस मे मै नहीं पड़ना चाहता जहां मुंडे मुंडे मतीरभीन्ना की स्थिति है मेरे लिए तो यह सब एक अजूबा जैसा ही था शायद आप इसे अंधविशास भी समझ लें । मेरे मन मे यह प्रश्न बार बार कौंध रहा है की एक कुत्ता एक बकरी से कैसे बात करता होगा एक भालू एक शेर से कैसे बात करता होगा। दादी माँ की सुनाई उन तमाम कहानियों पर अब हजारों सवाल करने का मन करता है जिनहे बचपन मे मै सहजता से स्वीकार कर लेता था ,अब अगर वो मिलें तो उनसे इस प्रश्न का जवाब चाहूँगा कैसे एक बंदर के चिड़िया का घोसला उजाड़ने पर चिड़िया ने बंदर से बात की होगी ,जंगल की सभाओं मे कैसे सब पशु पक्षी आपस मे बात करके शेर से अपनी समस्याएँ कहते रहे होंगे ,उनके संपर्क भाषा उनकी बोलचाल की भाषा क्या रही होगी ,जातक कहानियों मे तो अथाह सागर है इस तरह की बातों का । दादी कौए के मुंडेर पर बैठ कर कांव कांव कर देने से कैसे समझ जाती थी की कोई अतिथि आने वाला है , कबूतर की गुटरगूँ के कुछ देर बाद ही डाकिया परदेश से पिताजी की चिट्ठी ला  देता था अब जब की इस शहर की चकाचौंध मे दिन रात का पता ही नहीं चलता खुद से ही बात किए वक्त गुजर जाता है तो ये यादें सुखद आश्चर्य दे जाती हैं , की हमारी वर्तमान पीढ़ी कैसे पशुपक्षियों से कटती जा रही ,और पिंजरे मे बंद तोता ,सर्कस के बंदर भालू,जंजीरों मे बंधा कुत्ता तो हमारी गुलामी की भाषा ही बोलते हैं सच तो यह है की हम उन्हे समझने की संवेदना ही खोते  जा रहे हैं कोयल मोर पपीहा अब सपनों मे भी नहीं बोलते। पता नहीं ये हमसे नाराज़ होकर लगता है किसी और दुनिया मे चले जा रहे हैं। भाषा विज्ञान की बहस से निकलकर हमे इनकी संवेदनाओं से जुड़ना पड़ेगा नहीं तो यह शोरगुल से भरी दुनिया हमे एक दिन पागल ही बना देगी जहां शायद हमारी कोई जुबान ही न बचे। उदयपुर के उस वाकये के बाद कौवे की कांव कांव सुनते ही अब बरबस उनकी तरफ खींच जाता हूँ और वह बुजुर्ग मेरी यादों मे बस जाते हैं। और यही लगता है की बस एक भाषा प्यार की ही है जिसे पशु पक्षी भी हममे महसूस करके एक सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करते हैं और वह हमारे पास आते हैं इसी कारण वह हमारी गतिविधियों  का अनुमान भी कर लेते हैं ,और जब इंसान इंसान से ही अपने निहित स्वार्थों के कारण नफरत करेगा तो पशु पक्षी तो बहुत दूर चले जाएंगे हमसे ।
नाम –प्रभान्सु ओझा

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