प्राण हैं पेड़
आज पर्यावरण दिवस है ,सर्वप्रथम प्रकृति को लेकर आप सबसे
ढेर सारी उम्मीदें क्यूंकी यह समय अब शुभकामनाओं का नहीं रहा बल्कि गहराते पर्यावरण संकट के बीच चिंता
का हो गया है । बात आज से छह दिनों पहले की है 31 मई को शाम के करीब 6 बजे देश की राजधानी
दिल्ली मे भयंकर तूफान के बीच ढेर सारे पेड़ गिरे,बिजली के खंभे
गिरे ,कमजोर घर गिर गए ,दस के आसपास लोगों की मृत्यु हुयी और पूरा माहौल एक
अजीब किस्म के अंधेरे मे तब्दील हो गया जहां बेमौसम बारिश है ,बेतहाशा गरम होती धरती है और हर रोज प्रदूषित होता पानी है । थोड़ी देर बाद
फिर से धुआँ फेंकती गाडियाँ रफ्तार भरती हैं
,जहर उगलते कारखाने फिर से चालू हो जाते हैं और विश्व मे वायु
प्रदूषण की राजधानी बन चुकी दिल्ली के बाशिंदे फिर से अपने कम धंधों मे लग जाते हैं।
यहाँ ये सभी
घटनाएँ सामान्य नहीं हैं ,ये दरअसल बेबस प्रकृति की पुकार है की
मानव सचेत हो जाए। जो पेड़ पौधे हमारी प्राणरक्षक ऑक्सीज़न के श्रोत हैं आज हम उन पर
कुल्हाड़ियाँ चलाने मे जरा भी संकोच नहीं कर रहे हैं ,वन जंगल
बेतहासा तरीके से कटे जा रहे हैं ,चाहे शहर हों या गाँव हर जगह
इन्सानों मे एक अजीब से लालच ने घर कर लिया है और वह अपने स्वार्थों के नशे मे अंधा
हो गया है । हम से ने एक कहानी सुनी है की एक व्यक्ति को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी
मिल जाती है और हर रोज वह एक सोने का अंडा देती है और उस व्यक्ति का जीवन खुशहाल बन
जाता है ,एक दिन उस पर लालच का भूत सवार होता है और वह सोचता
है की क्यूँ न इस मुर्गी के पेट को चीरकर अंडे एक ही दिन मे प्राप्त कर लिए जाएँ ,वह मुर्गी पर चाकू चलता है और मुर्गी मर जाती है और वह हाय हाय करता पछताता
रह जाता है । क्या वही गलती पेड़ पौधों को काटकर मानव नहीं कर रहा है ,जहां हरा भरा समाज अचानक से रेगिस्तान
बनता जा रहा है । बढ़ते तापमान ,सूनामी,बाढ़ ,तूफान के पीछे एक सबसे
बड़ा कारण पेड़ों का काटा जाना भी है ,जंगल के जंगल काटकर बसाये
जाने वाले उद्योग धंधे हैं । हम सब एक कंक्रीट की दुनिया तैयार कर रहे हैं ,जहां हरियाली बस किताबों और कृतिम रंगों मे सिमट कर रह गयी है । बचपन से यह
कहावत सुनता आ रहा हूँ की सावन हरे न भादव सूखे , भादव तो सूखा
ही था अब सावन भी सूख गया है । एक कहावत थी की सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखाई
देता है अब या बदल चुकी है अब है की स्वार्थ के अंधे को सिर्फ भौतिक विकास ही विकास
दिखाई दे रहा है जहां पेड़ पौधों के लिए न कोई संवेदना है और न ही प्यार ,पेड़ पौधों
मे भी एक दिल धड़कता है वह भी हमसे कुछ कहना चाहते हैं लेकिन अब हमने अपने कान बंद कर लिए हैं । याद आता है वह समय जब पेड़ पौधों
की प्रकृति के माफियाओं से रक्षा के लिए एक
गाँव के अशिक्षित ग्रामीण लोग पेड़ पौधों से
लिपट गए थे जिसे इतिहास मे हम चिपको आंदोलन के नाम से जानते हैं और आज का पढ़ा लिखा
इंसान खुद इन निःस्वार्थी पेड़ पौधों को अपनी भौतिकतावादी लालसाओं की पूर्ति के लिए
उजाड़ दे रहा है ,उसने इन पर अपना असीमित अधिकार तय कर लिया है
वह इन्हे अपनी विरासत मान बैठा है । विज्ञान तकनीकी और यांत्रिकता से लैस होकर छद्म
आधुनिकता का दंभ भरने वाले इंसान को यह समान्य सी बात नहीं पता की शुद्ध हवा कभी पैसों
से नहीं मिलेगी और बनावटी कृतिम पार्कों के बीच टहलकर वह स्वस्थ्य नहीं रह सकेगा ये
दमघोंटूँ संयंत्र उसे मरीज ही बना रहे हैं।
हमे यह समझना होगा की जिस तरह से हम 100 दिनों
का खाना एक दिन मे नहीं खा सकते उसी तरह एक इलाका निर्जन और एक इलाके मे लगातार 100
वृक्ष लगाकर पर्यावरण का विकास नहीं कर सकते हैं ,पर्यावरण के
सौंदर्यीकरण से भला नहीं होने वाला है ,समय आ गया है की हम सचेत
हो जाएँ और अधिक से अधिक पेड़ पौधे लगाए जंगलों की रक्षा करें । ,मेरे कहने का आशय यह कतई नहीं है की हम फिर से गुफाओं मे वापस चले जाएँ लेकिन
महलों मे जाने की लालसा मे पागल भी ना हो जाएँ वनों की अंधाधुंध कटाई करके अपने जीवन
की रीढ़ ही काट दें और फिर सब कुछ नष्ट हो जाए माया मिले ना राम । एक पौधे को वृक्ष
बनने मे सालों साल लग जाते हैं और काटने मे बस कुछ पल इसलिए कुल्हाड़ी उठाने से पहले
लाख बार सोचें की कहीं यह हम अपने जीवन पर ही तो नहीं चलाने जा रहे ।आइये आज ही संकल्प
लें एक पेड़ लगाने का और मानव मात्र को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का ,इस आंदोलन को घर घर तक पहुँचने का । prabhanshuojhakukur.blogspot.in email-prabhansukmc@gmail.com
sarthak lekh.......prerna deti hui.
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