Saturday, 17 May 2014

ये कहाँ आ गए हम

               ये कहाँ आ गए हम
अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक मित्र से बात हो रही थी जो की  काफी  संभ्रांत परिवार से हैं उनका ऐसा मानना था की अगर पानी  का संकट बढ़ रहा है तो इससे उन्हे क्या दिक्कत होने वाली है बोतल बंद शुद्ध  पानी  तो रहेगा ही l शायद उनकी यह बात सुनकर आपको आश्चर्य हो रहा हो मुझे भी उस समय हुआ लेकिन बाद मे मैंने देखा की उनके वर्ग से आने वाले हर व्यक्ति का  लगभग यही मानना है l शायद उन्हे यह बात नहीं पता की धरती के गर्भ मे ही अगर जल नहीं बचा तो बोतल बंद पानी  कहाँ से आएगा l जलसंरक्क्षन के प्रति हम इतने लापरवाह हैं की बारिश का पानी नालियों मे जाकर बर्बाद हो जाता है l   पर्यावरण के प्रति बेरुखी हमारे समाज मे दिन प्रतिदिन बेतहाशा गति से बढ़ती जा रही है विकास के पूंजीवादी मॉडल मे हम इतना भ्रमित हो गए हैं की हम विकास के असली मतलब को हम भूल गए हैं जो सिर्फ भोग विलास तक  सिमटा है  मानव सिर्फ अपने अधिकारों की बात कर रहा  है जब की अगर हम अगर प्रकृति की बात करें तो उसकी मूलभावना ही नितांत कल्याण कारी है l बचपन से ही यह कहावत सुनता आ रहा हूँ की  वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखई नदी न संचय नीर ,परमारथ के कारणे साधुन धरा शरीर l यह भी कहा जाता है की जब पेड़ों मे फल आता है तो वह विनम्रतापूर्वक झुक जाते हैं परंतु इंसान को जरा सा बुद्धि आयी तो वह अकड़ गया वह जंगलों पर नदियों पर पशु पक्षियों पर तथा समस्त प्राकृतिक  संसाधनों पर अपना असीमित अधिकार तय कर लिया l बेतहासा तरीके से उन जगलों को काटा गया जिनके बारे मे यह कहा जाता है की एक वृक्ष दस पुत्र समान l पुत्र प्राप्ति के लिए तो इंसान न जाने क्या क्या जतन कर रहा है यहाँ तक गर्भ मे ही लड़कियों को मार देता है l क्या हम पैसों के बल पर शुद्ध हवा खरीद सकते हैं ? क्या धुआं उगलते कारखानों मे हम चैन की सांस ले पाते हैं l स्वास्थ्य जीवन और स्वस्थ्य चिंतन के लिए जरूरी है की स्वस्थ्य पर्यावरण हो जिसका पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित हो जहां पशु पक्षी अपने प्रकृतिक आवास मे चैन से घूम सकें l शहरों मे तो पर्यावरण की हालत चिंताजनक है ही गाँव भी अब अछूते नहीं बचे हैं ,अब प्लास्टिक की तुलसी पूजी जा रही है हैं और मिट्टी की मूरतें काँच और प्लास्टिक मे तब्दील हो रही हैं l पहले गांवों मे भोज के समय महुआ के पत्तों मे खाना   परोसा जाता था और मिट्टी के कुल्हाड़ों मे पानी सब प्रेम भाव से खाते थे परंतु आज स्थिति बेहद बदल सी गयी है अब इससे उनकी बेज्जती होती है गिलास से लेकर थाली तक भोज मे सब कुछ प्लास्टिकमय हो गया है l पीपल और बरगद बहुत मुश्किल से मिलते हैं उस हरियाली पर बाजार की नजर लग गयी है l हर संतुलित गाँव मे एक असंतुलित शहर बस गया है और स्थिति दिन ब दिन डरावनी होती जा रही हर गाँव के चारों ओर सुंदर बाग बगीचों की जगह ईंट बनाने की चिमनियाँ हैं जो किसानों की उपजाऊ मिट्टी को लील जा रहा हैं और खेत के नाम पर गड्ढे बच रहे हैं l चाहे शहर हों या गाँव हर जगह एक छद्म आधुनिकता का दौर चल रहा है हरदम मोबाइल कम्प्युटर और तकनीकी से चिपके रहने वाले युवावों  को यह नहीं पता की इनका  रेडिएसन उनके दिल दिमाग आँख कान सबकी क्षमता को कम कर रहा है l

वायु प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण सब दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं जिस हिमालय पर हम गर्व करते नहीं थकते वह पिघल रहा है तमाम ग्लेसियर पिघल रहे हैं ,अब वक्त आ गया है की हम सचेत हो जाएँ नहीं तो धार्मिक आधार पर सभ्यता के नष्ट होना भले ही मिथक हो परंतु पर्यावरण की ऐसे ही क्षति होती रही तो दुनिया बहुत जल्द नष्ट हो जाएगी l   प्रभान्सु ओझा (prabhansukmc@gmail.com) blog.. PRABHANSHUOJHAKUKUR.BLOGSPOT.IN 

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