Thursday, 16 October 2014

अंधेरे का शोकगीत

१६ मई २०१४ के बाद भारत मे आए राजनीतिक भूचाल के बाद भारत मे ज़िंदगी के साथ ही साथ कविता भी अपने बदले रूप मे सामने आई है । यह देखना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है की     एक साहित्यकार राजनीति को कैसे देखता है और कितनी निर्भीकता के साथ सच्चाई को अपनी कविता कहानी उपन्यास मे व्यक्त कर पता है. ऐसे ही बीते शनिवार ११ अक्टूबर २०१४ को भारतीय प्रेस क्लब द्वारा १६ मई के बाद कविता के बदले स्वरूप को लेकर एक कविता गोष्ठी का आयोजन किया जिसमे कुल मिलाकर समकालीन कविता के १०  नामचीन कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। नवीन कुमार की कविता सारे मारे जाएंगे और बाज़ार मे बहुमत पूर्ण बहुमत के बाद लोकतंत्र मे उपजी बिडंबनाओं को व्यक्त करती नज़र आईं. अंजनी कुमार ने  गुम हो गये हैं लोकतंत्र मे पक्ष विपक्ष और कविता अर्थशास्त्र मे उलझ गयी है नहीं दिख रही है कोई अच्छी कविता, कविताएं पेश की उनकी ये कविताएं  अच्छे  दिनो के छलावे को उजागर करती नज़र आईं। गणेश रायबोले  की कविता गलत सपना १६ मई  के बाद भी चलने वाले १६ मई के सिलसिले को व्यक्त करती नज़र आई। उनकी पूंजीवाद के गंभीर जाल मे उलझते भारतीय लोकतंत्र मे पैसा कुछ नहीं है ज़िंदगी के खिलाफ साजिश है कविता संवेदना के तारों को झकझोर गई। अवनीश की कविता शोकगीत चीजें के बनाए अर्थ को स्वीकारने की मजबूरी उजागर करती दिखी। पाणिनी  आनंद की मुक्तक तुकबंदी से युक्त कविता नमामि गंगे बदलते चेहरों की असलियत को बड़े ही सरल लहजे मे उजागर करती नजर आईं और लगा रहे हैं गाँधी को भोग गोडसे के लोग सपाट बयानी की मिसाल पेश कर गयी। प्रधामंत्री के अमेरिका दौरे मे उमड़ी भीड़ मे तमाम भारतवंशियों मे अचानक उपजे भारत प्रेम को उनकी कविता माई फ्रेंड्स इन अमरीका सवाले को घेरे मे डाल गयी। निखिल आनद गिरि ने अपनी कविता हैंग ओवर मे अच्छे  दिनो को एक महामारी के रूप मे पेश किया और कविता उनका महान होना तय था थोपी गयी महानता के सच को उज़ागर कर गयी। अभिषेक श्रीवास्तव ने हाल ही मे दिल्ली के एक चिड़िया घर मे शेर के दडबे मे घुसे आदमी को मार डालने की घटना के बाद मे उस शेर के बचाव मे तमाम तर्क गढ़े जाने को हाल की राजनीतिक परिस्थियों से जोड़ते हुये कुछ यूं पेश किया की एक शेर के बचाव मे आदमी कितने तर्क गढ़ सकता है शेर शेर होता है आदमी आदमी .हाल ही प्रकाशित चर्चित काव्य संग्रह पुतले पर गुस्सा के रचयिता वरिष्ठ  कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने बड़ी ही गंभीर और संवेदनशील तरीके से पुतले पर गुस्सा कविता के मध्यम से यह सवाल उठा गए की क्या सच मे  हर साल पुतले मे जला दिया जाने वाला रावण मर जाता है या की वो खुद हम पर ही हंसता है हमारे ही बीच अपने कई रूपों  मे मौज़ूद होकर। वे लोग जिन्हे की एक ऐसे आदमी की तलाश है जो की कमल को राष्ट्रीय फूल नहीं मानता है और ऐसे आदमी की खोज मे वो लोग अंधेरे की भी परवाह नहीं कर रहे मिथिलेश श्रीवास्तव की कविता मे व्यक्त ये सच्चाई एक ऐसे तानाशाही समाज की का अक्स खींच गयी जहां तानाशाह के विरोध का अंज़ाम मौत है और ऐसी राजनीतिक सपाट बयानी रघुवीर सहाय की कविताओं को एक कदम और आगे  बढ़ाती नज़र आई। रंजीत वर्मा अच्छे  दिनो की धोखाधड़ी से महफूज़ जगहों की खोज मे नज़र आए क्यूंकि ऐसे ही लोकतंत्र को बचाया जा सकेगा। गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि  मंगलेश डबराल ने इस काव्य गोष्ठी मे किये गये कविता पाठ को अंधेरे का शोकगीत नाम दिया। और ऐसे तानाशाह की छवि को पेश किया जो बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश करता है की वह मनुष्य है। चौंधियाते यथार्थ के अंधेरों के बीच सोने से पहले एक गिलास पानी पीना और उसके बचे रहने की गुज़ारिश उस सच को उकेर गयी जहां १६ माई के बाद इंसान आसमान नदी जल झरने पशु पंक्षी सबके अर्थ बदल गये हैं. कुल मिलकर यह कविता पाठ अपने किस्म मे अनोखा और एतिहासिक रहा जहां सिर्फ १६ मय की बाद की परिस्थियों पर लिखी गयी कविताएं ही शामिल थी। गोष्ठी   के संचालक ने बताया की ऐसे कविता  पाठ को देश के कयी महत्वपूर्ण स्थानों पर करने की योजना है। 
    प्रभांशु ओझा 
    दिल्ली विश्वविद्यालय 


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